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Wednesday, October 25, 2017

love से ज्यादा महत्वपूर्ण desires है, दिमाग के लिये

मेघा मैत्रैयी
कभी करीब 60 की उम्र के एक आदमी से मुलाकात हुई थी, अस्पताल में इंटर्नशिप के दौरान। बुरी तरह डिप्रेशन में था। काफी सीधा-साधा किस्म का इंसान था जो जिंदगी भर कोई ना कोई जिम्मेदारी उठाता रहा परिवार की, पर अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके सारे रिश्ते खराब क्यों हो गए।

बीवी लड़ती रहती थी, बच्चे उपेक्षा करते थे, रिश्तेदारों में भी कोई वैल्यू नहीं थी। कुल मिला कर वह पनीर की सब्जी में आलू की तरह हो गया, जिसको लोग चुन-बिछ कर अपनी प्लेट में नहीं डालते। बस इसीलिए दुःखी था।

बार -बार बोलता कि मैंने unconditional प्यार किया सबसे पर अब नफरत हो गयी है।

समस्या इस unconditional love के concept में ही है। ये exist ही नहीं करता। पर हम इस बात को समझते ही नहीं है।

एक माँ अपने बच्चे से प्यार करती है क्यूंकि ऐसा करने से उसकी maternal instinct को सन्तुष्टि मिलती है। एक  सैनिक अपने देश के लिये जान दे देता है खुशी-खुशी क्योंकि उसका दिमाग उसे बताता है कि वो अगर ऐसा नहीं करेगा तो सन्तुष्ट नहीं होगा। एक इंसान पूरे जीवन दूसरो की सेवा में लगाता है क्यूंकि उसे ऐसा करने से खुशी और सन्तुष्टि मिलती है।

हमें लगता है कि इनका unconditional प्यार और निस्वार्थ भाव है,  इनके कर्मो के पीछे। लेकिन नहीं। दिमाग स्वार्थी होता है, वो आपसे तब तक कोई काम नहीं कराएगा जब तक उसको उस से किसी प्रकार की सन्तुष्टि ना मिले।

उदाहरण के लिए एक ऐसा मरीज जिसके hypothalamus में feeding centre को कोई ऐसी क्षति पहुंच गयी हो कि वह काम करना बंद कर दे, तो उस इंसान को भूख लगेगी ही नहीं। उसका शरीर कमजोर होता जाएगा, वह मरने की कगार पर पहुंच जाएगा पर खायेगा नहीं, क्योंकि दिमाग ने उसे यह बताना बन्द कर दिया है कि खाना उसकी जरूरत है, और जो चीज  आप के दिमाग के हिसाब से आपके भले के लिये जरूरी नहीं है वो आप नहीं करेंगे, भले ही आपकी हालत कितनी भी critical हो जाये।

यही बात प्यार के साथ भी है। हम सिर्फ इसीलिए दुसरो का ख्याल नहीं रखते क्योंकि सामने वाले की जरूरत है, बल्कि हमारे लिये जरूरी है ऐसा करना।

Unconditional love तब होता जब कोई अपना आपको पचास जूते रोज मारे, आपको 3rd डिग्री टार्चर दे ,आपकी जिंदगी में डंडा किये रहे लेकिन तब भी आप उसी दृढ़ता से उससे प्यार करते रहें; अगर आप ऐसा नहीं कर सकते तो इस फालतू कॉन्सेप्ट को भूल जाइये और अपनी वैल्यू create करना सीखिए।

आज गृहणियां कितना भी कर दे, उनकी वैल्यू अक्सर कमाऊं पति से कम होती है परिवार में, क्योंकि ये हर काम जिम्मेदारी समझ कर करती है बेवकूफों की तरफ( yes, they are not निस्वार्थ, they are बेवकूफ)। वो कभी अपने काम का वैल्यू नहीं लेती क्योंकि हमारे सामाजिक ताने - बाने ने यह बात दिमाग में फिट कर दी है कि valuable काम वही है जिसकी कोई कीमत हो नोटों में।

मुझे समाज को देखते हुए यह लगता है कि आपमें से ज्यादातर लोग granted हैं, किसी ना किसी के लिये। तो एहसान ना जताये, घमण्ड ना दिखाये पर अपनी value create करना शुरू करें; क्योंकि दुनिया में कोई नहीं है जो आपसे unconditional love करता है।  love से ज्यादा महत्वपूर्ण desires है, दिमाग के लिये। आप जब तक जरूरत हैं, तभी तक प्यारे हैं। ना तो आपकी गलती है ना आपके उपेक्षा करने वालों की, पर इस नालायक दिमाग के काम करने का तरीका ही  यही है। ☺

Wednesday, October 18, 2017

अलविदा ताज भाई ..बहुत याद आओगे तुम

शशांक द्विवेदी
पिछले दो दिनों से मन बहुत ख़राब और उदास है ,ताज भाई की असमय ,अस्वाभाविक और संदिग्ध परिस्तिथियों में हुई मृत्यु ने मुझे व्यक्तिगत तौर पर बुरी तरह से झकझोर दिया है ..ताजबाबू मेरें सबसे अच्छे मित्रों में से एक था और दिल के बेहद करीब था .अभी भी ताज के आगे “था “ लिखनें में हाथ कॉप जातें है . बचपन से ही(सरस्वती शिशु मंदिर ), शिशु से हमारा साथ और याराना रहा , दिल्ली –एनसीआर में भी ताज एक मात्र मेरा ऐसा मित्र था जिसको मै कभी भी पूरे हक़ से साथ बुला सकता था ,हम दोनों अक्सर मिलते थे ,जब भी मिलनें का मन होता तो सीधे बिना उसको बताये नोयडा के आईटी स्टीलर पार्क में उसकी कंपनी इनोडेटा पहुँच जाता या फिर वो मेरे घर आ जाता ,सबसे बड़ी बात हमारें रिश्तों में जो थी वो ये कि हम हमेशा बिना किसी प्रोफेशनल काम के ही मिलते थे .ताज भाई मेरी जिन्दगी में एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन पर मै आँख बंद कर भरोसा करता था .कहते है ना कि एक लॉयल मित्र हजार रिश्तेदारों से हमेशा बेहतर होता है . वो मेरा ऐसा पारिवारिक मित्र था जिस पर मुझे और प्रियंका दोनों को सबसे ज्यादा भरोसा था .
आज के इस बुरे दौर में भी ताज भाई की वजह से इंसानियत और आदमियत पर भरोसा कायम था . मेरी किसी भी परेशानी में वो मुझसे ज्यादा ही परेशान होता...अपने घर की बहुत सारी आर्थिक समस्याओं और जिम्मेदारी के होते हुए भी हमेशा मुस्कुराते हुए ही मिलता ,पिछले दिनों ३ अक्टूबर को घर आया तो बोला भाई २१ नवंबर को बहन की शादी फिक्स हो गयी है ,अब उसकी तैयारी करनी है .अपने घर और माता –पिता की जिम्मेदारी निभाते निभाते वो अपने सारे सपने ही भुल चुका था .इस बेरहम दुनियाँ के सैकड़ों कडवे अनुभव उसके पास थे फिर भी इंसानियत उसमें सबसे ज्यादा ही थी .  धर्म और राजनीती को सबसे बेकार की चीज मानता था वो , उसका स्पष्ट मानना था कि दुनियाँ में धर्म के नाम पर ही सबसे ज्यादा हिंसा की जा रही है .मुस्लिम होने की वजह से कई बार वो सामाजिक कटुता का शिकार भी हुआ लेकिन फिर भी बोलता था कि भाई हमारे धर्म के  लोगों ने जिस तरह जेहाद के नाम पर पुरी दुनियाँ में कत्लेआम मचा रखा है उसकी कुछ कीमत तो हमें भी चुकानी होगी ही .. बोलता था कि दुनियाँ में अगर कही जन्नत है तो वो अपना देश भारत ही है ,अपना देश और इस देश की मिट्टी ही हमारा सब कुछ है . ताज भाई आस्तिकता और नास्तिकता के बीच में हमेशा इंसानियत को लेकर खड़ा रहें  . जिन समस्याओं और संघर्षो को ताज भाई जी रहें थे उतना तो मै इस जिन्दगी में नहीं जी पाता ..बहुत  बार घर ,समाज और मित्रों के बीच भी ताज भाई उपेक्षा का शिकार रहें लेकिन कभी अपनी जिजीविषा को मरने नहीं दिया . हम दोनों की मित्रता धार्मिक आधार पर हिंदू –मुस्लिम से बहुत ज्यादा ऊपर थी,उसके साथ रहते हुए मुझे हमेशा लगता कि यार इस देश में जो भी हिंदू –मुस्लिम हो रहा है वो बेकार की बात है ..धन प्रधान इस आधुनिक युग में ताज भाई जैसा निस्वार्थ भाव मैंने अपने किसी भी मित्र में नहीं देखा . पैसे के पीछे मैंने आज तक ताज भाई को भागते हुए नहीं देखा ..मै अक्सर जब उससे मिलता तो बोलता चल भाई आज बाहर पार्टी करते है ,तो बोलता यार बेवजह से पैसे खर्च मत कर चल तुझे अरहर की बेहतरीन दाल चावल बना कर खिलाता हूँ (दाल चावल हम दोनों का ही फेवरेट था ),बोलता यार घर के बाहर कितना भी पैसा खर्च कर ले लेकिन संतुष्टि नहीं मिलती. उसकी खूबियों की जितनी बात करू उतनी ही कम है लेकिन लोगों की निस्वार्थ सेवा भावना उसमें सबसे बड़ी थी .पिछले दो दिनों से हर पल उसकी याद आती है ,आँख बंद करते ही उसका चेहरा याद आता है ,मुझे यकीन ही नही हो रहा कि अब वो इस दुनियाँ में नही रहा . इस तरह से उसकी असमय मृत्यु की मैंने कभी कल्पना भी नहीं थी . वो मेडिकली भी फिट था ,किसी भी तरह के नशे और व्यसन से भी दूर था फिर भी अचानक उसका  कमरें में मृत पाया जाना मुझे किसी साजिश की आशंका से भर देता है .लेकिन दुसरे पल यह भी सोचता हूँ कि उसकी कभी किसी से कोई दुश्मनी /मारपीट /लड़ाई /विवाद/अफेयर  आदि कुछ नहीं था ऐसे में कोई उसे क्यों मारेगा .खैर इन सब सवालों के जवाब अभी भविष्य की गर्त में छिपें है लेकिन ताज भाई के इस तरह जाने ने मुझे इस एनसीआर में बिलकुल अकेला छोड़ दिया .क्योंकि वो एकमात्र मेरा ऐसा मित्र था जिससे मै हमेशा बिना किसी काम के मिलता था . उसने यह भी साबित किया कि  प्रपंच ,झूठ और दिखावे के बिना भी मित्रता  सहज तरीके से निभाई जा सकती है . खैर ताज भाई तुम हमेशा मेरी यादों में रहोगो और तुम्हे भुला पाना संभव ही नहीं है ..ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति दे ..भावभीनी श्रधांजली  

(ताज बाबु की ये अंतिम फ़ोटो मैंने अपने मोबाइल से पिछले ३ अक्टूबर को खींची थी ,अफ़सोस कि उस दिन मै उसके साथ एक सेल्फी नहीं ले सका ..बेहद व्यस्तता की वजह से उस दिन ज्यादा बात भी नहीं हो पाई )

Friday, May 20, 2016

सी फार करप्शन , सी फार कांग्रेस होता है

शशांक द्विवेदी 
कल दिल्ली एमसीडी के नतीजें आनें के बाद बहुत सारे प्रगतिशील और वामपंथी लोग बहुत उछल रहें थे (कांग्रेस की ४ सीटें आने पर ),इसे लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा बता रहें  थे ,अजय माकन तो इसका श्रेय पप्पू गाँधी को दे रहें थे और कह रहें थे सांप्रदायिकता हार गई ..खैर आज पाँच राज्यों के नतीजों के बाद तो कांग्रेस रसातल में चली गयी ,,तो क्या इसका भी श्रेय ये प्रगतिशील सेकुलर लोग पप्पू गाँधी को देंगे ? या फिर गांजा पीकर कुछ नहीं बोलेंगे आजा ..फिलहाल देश “कांग्रेस मुक्त भारत” की तरफ बढ़ रहा है देश की ४३ फीसदी आबादी में भाजपा की सरकार है जबकि सिर्फ ७ फीसदी आबादी में कांग्रेस की सरकार है (एक बड़ा राज्य कर्नाटक और दो छोटे राज्य /केंद शासित प्रदेश ) बस अब इतनी ही औकात बची है कांग्रेस की देश में ...मै कई सालों से कह रहा हूँ कि कांगेस भर्ष्टाचार की पर्याय है ..मुझे लगता है कि जैसे सी फार करप्शन वैसे ही सी फार कांग्रेस होता है .इस पार्टी ने इस देश को ६० सालों में जिस तरह से लूटा है उतना तो भारत अंग्रेजो ,मुस्लिम और वाह्य आक्रमणकारियों ने पिछले २००० साल में भी नहीं लूटा ..सच्चाई तो यह है कि इस पार्टी ने इस देश की आत्मा को ही गिरवी रख दिया था ..हर दिन के घोटालें ,लाखों करोड़ के भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता ने इन्हें अब इनकी असली औकात बता दी है ..मुझे खुशी है कि आप भाजपा की केंद्र सरकार को चाहे अच्छी कहो या बुरी लेकिन कम से कम पिछले दो सालों में घोटाले तो नहीं हुए , न ही शायद कभी होंगे ..इसी को मै सबसे बड़ी उपलब्धि मानता हूँ ..आज देश में वामपंथ का मतलब कांग्रेस और कांग्रेस का मतलब वामपंथ हो गया है ,भारत का हर प्रगतिशील /सेकुलर आदमी कांग्रेस का समर्थक जरुर होता है क्योकि कांग्रेस की सरकारों के समय इन लोगों को भी मलाई मिली थी /भ्रष्टाचार का हिस्सा मिला था ..इस लिए इन दो कौड़ी के प्रगतिशील लोगों से अब सोशल मीडिया पर भी वैचारिक लड़ाई लडनी होगी क्योकि ज़मीन पर ये दोगले अब कही है नहीं ,जनता ने इनकी औकात बता दी है ,अब इन्हें यहाँ इनको आइना दिखाना है ..भाजपा को असम की ऐतिहासिक जीत पर बधाई और बाकी सभी राज्यों में बेहतर प्रदर्शन के लिए बधाई ..

Wednesday, October 7, 2015

दादरी में कथित सेकुलरों ने दिया सांप्रदायिक रंग

शशांक द्विवेदी 
दादरी में जो हुआ वो गलत हुआ लेकिन उसके बाद जो हुआ वो तो और भी ज्यादा ग़लत है .जितनी मेरी समझ है उसके अनुसार दादरी का मामला सुनियोजित नही था ,ये एक अफवाह के बाद हुई दुर्घटना है जिसे बाद में सेकुलर लोगों ने सांप्रदायिक रंग दे दिया ,इस मामले पर टीवी चैनलों की बेवजह रिपोर्टिंग और तूल देने से यह और बिगड़ गया .अब मुख्य सवाल यह है कि जिन लोगों ने अख़लाक़ को मारा वो तो दोषी है ही लेकिन बाद में जिन बुद्धिजीवियों /सेकुलर लोगों ने इसे जबर्दस्त तूल दिया क्या वो दोषी नहीं है ?काटजू ने कहा ,शोभा डे ने कहा कि हमनें गौमांस खाया ,क्या कर लोगों ,केरल में वामपंथियों ने बाकायदा आयोजन करके गौमांस खाया ...क्या इस सबसे हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होगी ? मै यहाँ हिन्दू –मुस्लिम की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि सीधे सीधे यह कह रहा हूँ कि ये कैसा वामपंथ है ,ये कैसा सेकुलरिज्म है जिसे हिन्दुओं की भावनाएं भड़काने या आहत करने में आनंद आ रहा है .ये बात भी यहाँ जानना जरुरी है कि ये सब लोग मुस्लिमों के साथ भी नहीं है बल्कि ये वो लोग है जो उनका सबसे बड़ा नुक्सान कर रहें है .आखिर ये वही बुद्धिजीवी है जिन्होंने दादरी के बाद इतना रायता फ़ैला दिया कि स्पष्ट तौर पर हिन्दू –मुस्लिम ध्रुवीकरण दिख रहा है .हर बार की तरह ,दादरी के बाद फिर मोदी को ये लोग गरियाने लगे ,दोषी बताने लगे लेकिन मुस्लिम समुदाय को ये सोचना होगा कि इन बुद्धिजीवियों के विधवा विलाप से किसे  फ़ायदा  होगा ?सीधी सी बात है इससे मोदी और भाजपा को ही फ़ायदा होगा क्योकि जब मुस्लिम एक तरफ होगा तो हिन्दुओ में भी यही भावना आयेगी ..कहने का मतलब सीधा है कि सेकुलर लोगों ही दादरी को सांप्रदायिक रंग दे दिया..जिसका सीधा फायदा ग़ाली खाने वाली भाजपा और मोदी को ही होगा और हर बार की तरह मुस्लिम समाज को फिर ये बुद्धिजीवी ठग लेंगे ...

Monday, October 5, 2015

हिमानी त्यागी का लेख और कवितायेँ

हिमानी त्यागी
दहेज का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में जो विचार कौंधते है वो हैं ससुराल पक्ष द्वारा लडकी को दहेज के लिये प्रताडित करना,लडकी को ससुराल से निकाल देना या फिर  बारात ले जाने के बाद वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष के सामने माँग रखना और वो माँग पूरी न होने पर बारात का वापस लौट जाना | इन घटनाओं को सुनकर या पढकर हम सभी के मुँह से 'गलत' शब्द निकलता है,हम ऐसा करने वालो को अपराधी करार देते हैं | 
लेकिन यदि इस मुद्दे के दूसरे पक्ष पर गौर किया जाए तो उसमें  शादी की बात आते ही लडके वालो की ओर से पहला सवाल शादी के बजट से सम्बन्धित ही होता है और यदि बजट उनकी इच्छा से कम हो तो उन्हे आगे बात करने में कोई दिलचस्पी नही रहती,इसमे वधू पक्ष भी पीछे नही रहता,लडकी के पिता क्योंकि अच्छा रिश्ता हाथ से नही जाने देना चाहते इसलिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार है,भले ही उन्हे कर्ज ही क्यों न लेना पडे | आश्चर्य की बात ये है कि हमारा समाज इसे दहेज नही बल्कि परम्पराओं का नाम देता है |जबकि सच्चाई ये है कि यें परम्पराएँ उस दहेज की मांग से भी ज्यादा खतरनाक है | इन परम्पराओं को निभाने के लिये एक इंसान का पूरा जीवन कर्ज चुकाने में चला जाता है,ये परम्पराएँ एक इंसान की रातों की नींद व दिन का सुकून छीन लेती है |लेकिन अफसोस कि इस बुराई को खत्म करने की तरफ न तो सरकार का ध्यान जाता है और न ही समाज का | 
यदि कोई पिता अपनी बेटी को बेच दे तो वहाँ का समाज उसे अपने साथ बैठने तक नही देता,उस इंसान को समाज से बेदखल कर दिया जाता है लेकिन विडम्बना ही है कि जो लोग खुलेआम बैठकर अपने बेटो का सौदा कर रहे हैं वही समाज उन्हे दुगुनी इज्जत दे रहा है | ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि बेटी का पिता होना किसी भी इंसान को कमजोर होने का एहसास कराता है और यही कमजोरी उसे इस बुराई के सामने झुकने के लिये मजबूर कर देती है | और ये कमजोरी इसलिए है क्योंकि एक तय उम्र के अन्दर बेटी की शादी होनी जरूरी है,यदि ऐसा नही होता तो समाज के ताने जीना मुश्किल कर देते है |
लेकिन क्या इस स्थिति को इसी तरह चलते रहने के लिए छोड देना समझदारी होगी | यदि देश की गुलामी के समय हर कोई यही सोच लेता कि हमारा आजाद होना असम्भव है तो क्या ये कार्य सम्भव हो पाता,यदि उस समय कोई भी अपना जीवन दाँव पर लगाकर ये बीडा न उठाता तो क्या हम आज एक आजाद देश के नागरिक होते |बाल विवाह व लडकियों को शिक्षित न करने जैसी कुप्रथाओं को कुदरत का नियम मानकर यदि कोई भी इस दिशा में प्रयास के लिए आगे न आता तो क्या ये बदलाव सम्भव था |
किसी भी क्षेत्र में बदलाव के लिए किसी न किसी को तो आगे आना ही पडता है |और इस विषय में ये उम्मीद युवाओं से की जा सकती है |देश के युवा इस बुराई को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है | बस जरूरत है तो केवल थोडे साहस व जागरूकता की |
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कमजोर हूँ नही,कमजोर बनाया जाता है मुझे 

जिन्दगी तो मिली पर जीने का अधिकार न मिला,
प्यार तो मिला पर अपनो का एतबार ना मिला,
आज हूँ पिता की "चिन्ता" तो कल पति की "जिम्मेदारी",
क्या बस यही पहचान है मेरी,
बेटा करेगा नाम रोशन ,बेटी तो होती है पराया धन,
यही सुनते-सुनते बीत गया मेरा बचपन,
मैं भी तो थी तुम्हारा ही अंश,फिर क्यूँ बना ली मुझसे इतनी दूरी,
ये नियति थी या थी जमाने की मजबूरी,
कमजोर हूँ नही मैं,कमजोर मुझे बनाया जाता है,
ताउम्र औरों के भरोसे जीना सिखाया जाता है,
गलती पर किसी ओर की,सिर झुकाना सिखाया जाता है,
पाप करे कोई ओर,मुँह मुझे छिपाना सिखाया जाता है,
अस्मिता को अपनी बचाने का यही रास्ता है तेरे पास,
गलत को सहन कर बन्द कर लेना अपनी आवाज,
ये जीवन है पाया या पायी है कोई सजा,
तमाम उम्र बीत गयी पर हमें हमारा वजूद न मिला,
हमसे तो अच्छे हैं यें परिंदे जिनका न कोई समाज है न अधिकारी,
सुबह बेखौफ भरते हैं उँची उडान खुले आसमान मे,और इसी में जी लेते हैं उम्र सारी



Friday, September 11, 2015

डिजिटल इंडिया से बनेगा स्मार्ट इंडिया


शशांक द्विवेदी 
दैनिक जागरण में प्रकाशित 
शहरी भारत की नई तस्वीर
दैनिक जागरण 
पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र सरकार की 2 सबसे महत्वपूर्ण और महत्वकांक्षी परियोजना “डिजिटल इंडिया “ और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को लॉन्च किया। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट  के अंतर्गत देश भर में 100 स्मार्ट सिटी का निर्माण किया जाएगा इसके साथ ही 500 नगरों के लिए अटल शहरी पुनर्जीवन एवं परिवर्तन मिशन और 2022 तक शहरी क्षेत्रों में सभी के लिए आवास योजना भी लॉन्च हुई । इन  परियोजनाओं के परिचालन दिशा-निर्देश, नियमों, लागू करने के ढांचे को केंद्र द्वारा राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, स्थानीय शहरी निकायों के साथ पिछले एक साल के दौरान की गई चर्चा के आधार पर तैयार की गई हैं। पीएम मोदी ने कहा कि हर शहरी गरीब को इस लायक बनाया जाएगा कि उनके पास अपना घर होगा। स्मार्ट सिटी प्रॉजेक्ट के कई फायदे हैं, एक ओर जहां इससे वर्ल्ड क्लास शहरों का निर्माण होगा, जीवन स्तर में सुधार आएगा वहीं रोजगार की दृष्टि से भी यह काफी अहम है। केंद्र सरकार ने डिजिटल इंडिया मिशन के लिए 1,13,000 करोड़ का बजट रखा है जबकि देशभर में 100 स्मार्ट सिटी बनाने के लिए 48000 करोड़ का बजट प्रस्तावित है
पीएम मोदी ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि स्मार्ट सिटी परियोजना किसी भी राज्य पर थोपी नहीं जाएगी। बल्कि उस शहर के लोगों को खुद फैसला करना होगा। सच्चाई यह है कि भारत की 40 फीसदी आबादी या तो शहरी केंद्रों में रहती है या आजीविका के लिए इन पर निर्भर रहती है। शहरीकरण पर 25-30 साल पहले भी काम हो सकता था। शहरीकरण को एक अवसर के रूप में अगर देखा गया होता तो आज स्थिति कुछ और होती। स्मार्ट सिटी परियोजना का मकसद उपलब्ध संसाधनों और ढांचागत सुविधाओं का कुशल और स्मार्ट निदान अपनाने को प्रोत्साहित करना है ताकि शहरी जीवन को बेहतर बनाया जा सके तथा स्वच्छ एवं बेहतर परिवेश उपलब्ध कराया जा सके
स्मार्ट सिटी मॉडल :स्मार्ट लोग स्मार्ट शहर
दुनियाँ तेजी से बदल रही है,ऐसे में शहर भी बदल रहें है अब शहर भी स्मार्ट होते जा रहे है या फिर सरकार उन्हें स्मार्ट बनाना चाहती है ऐसे में सवाल उठता है कि   स्मार्ट सिटी आखिर होता क्या है? शायद ऐसी टाउनशिप जहां आपकी सभी जरूरतें पूरी हो जायें। आबू धाबी में मसदर से लेकर दक्षिण कोरिया के सोंगदो तक दुनियाभर में ऐसे शहरों के निर्माण पहले ही शुरू हो चुका है। हो सकता है कि आप जिस शहर में रह रहे हैं वो भी स्मार्ट करवट ले रहा हो। भविष्य के शहर में बिजली के ग्रिड से लेकर सीवर पाइप, सड़कें, कारें और इमारतें हर चीज एक नेटवर्क से जुड़ी होगी। बिल्डिंग की बिजली अपने-आप बंद हो जायेगी, ऑटोनोमस कार खुद पार्क हो जायेगी और यहां तक कि कूड़ादान भी स्मार्ट होगा। लेकिन सवाल यह है कि हम इस स्मार्ट भविष्य में कैसे पहुंच सकते हैं? शहर में हर इमारत, बिजली के खंभे और पाइप पर लगे सेंसरों पर कौन निगरानी रखेगा और कौन उन्हें नियंत्रित करेगा। आईबीएम, सीमन्स, माइक्रोसॉफ्ट, इंटेल और सिस्को जैसी तकनीकी कंपनियां शहर में पानी के लीकेज से लेकर वायु प्रदूषण और ट्रेफिक जाम तक हर समस्या को सुलझाने के लिए सॉफ्टवेयर बेच रही हैं।
 सिंगापुर, स्टॉकहोम और कैलिफोर्निया में आईबीएम यातायात के आंकड़े जुटा रही है और जाम लगने के बारे में एक घंटे पहले ही भविष्यवाणी कर रही है। रियो में आईबीएम ने नासा की तरह एक कंट्रोल रूम बना रखा है जहां स्क्रीनें पूरे शहर में लगे सेंसरों और कैमरों से आंकड़े जुटाती हैं। आईबीएम के पास कुल मिलाकर दुनियाभर में 2500 स्मार्ट शहरों के प्रॉजेक्ट हैं। कंपनी का कहना है कि वो स्मार्ट शहर की अपनी परियोजनाओं में लोगों को साथ लेकर चलती है। डबलिन में कंपनी ने सिटी काउंसिल के साथ मिलकर पार्कया एप तैयार किया है जो लोगों को शहर में पार्किंग की जगह ढूंढने में मदद करता है। अमरीकी शहर डुबुक में कंपनी स्मार्ट वाटर मीटर बना रही है और कम्यूनिटी पोर्टल के जरिये लोगों को डेटा उपलब्ध करा रही है ताकि वे पानी की अपनी खपत को देख सकें। चीन दर्जनों ऐसे नए शहर बसा रहा है जिसमें रियो की तरह कंट्रोल रूम स्थापित किए जा रहे हैं।
स्मार्ट शहर की कहानी में एक और अध्याय है और इसे एप, डीआईवाई सेंसर, स्मार्टफोन तथा वेब इस्तेमाल करने वाले लोग लिख रहे है। डॉन्ट फ्लश मी एक छोटा डीआईवाई सेंसर और एप है जो अकेले दम पर न्यूयॉर्क की पानी से जुड़ी समस्याओं को सुलझा रहा है। इसी तरह सेंसर नेटवर्क एग लोगों को शहर की समस्याओं के प्रति सचेत कर रहा है। शोधों के मुताबिक हर साल 20 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण के कारण होती है। एग लोगों को सस्ते सेंसर बेचकर वायु की गुणवत्ता के बारे में आंकड़े जुटा रहा है। लोग इन सेंसरों को अपने घरों के बाहर लगाकर हवा में मौजूद ग्रीन हाउस गैसों, नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड के स्तर का पता लगा सकते हैं। इन आंकड़ों को इंटरनेट पर भेजा जाता है जहां इन्हें एक नक्शे से जोड़कर दुनियाभर में प्रदूषण के स्तर को दिखाया जाता है। अनुमान के मुताबिक साल 2050 तक दुनिया की 75 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करेगी जिससे यातायात व्यवस्था, आपातकालीन सेवाओं और अन्य व्यवस्थाओं पर जबर्दस्त दबाव होगा। इस समय जो  स्मार्ट शहर बन रहे हैं वो बहुत छोटे हैं जैसे कोई नमूना हो।
स्मार्ट सिटी बनानें में समस्याएं
भारतीय शहरों को स्मार्ट सिटीबना पाना आसान काम तो बिल्कुल नहीं होगा सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि हमारे ज्यादातर पुराने शहर अनियोजित हैं, उनकी सही मैपिंग उपलब्ध नहीं है इन शहरों की 70 से 80 फ़ीसदी आबादी अनियोजित इलाकों में रहती है इन इलाकों में लगातार आवाजाही होती रही है ऐसे में काम की शुरूआत भी कैसे कर पाएंगे इससे तो लगता है कि नए शहर ही बसाए जाएँ, जहां हर चीज़ कि प्लानिंग पहले से की गई हो हमारे शहरों की संरचना और लोगों के रहन-सहन में बड़ी जटिलता है शहर की एक बड़ी आबादी पक्के मकानों में रहती है, जबकि लगभग उतनी ही आबादी सड़कों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहती है सरकार को ऐसे शहर बनाने चाहिए, जहां लोगों के रहन-सहन में थोड़ी समानता दिखे
डिजिटल इंडिया से बनेगा स्मार्ट इंडिया
डिजिटल इंडिया के सपने को साकार किये बिना स्मार्ट सिटी योजना को मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता । आनलाइन और डिजिटल तकनीक मदद से न सिर्फ शहरी क्षेत्रों में प्राप्त होने वाली सुविधाओं की गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकेगा बल्कि साथ ही साथ उपयोग के संसाधनो के खर्च को घटाया जा सकेगा तथा अधिक से अधिक लोगों तक इन सेवाओं को पहुंचाना भी आसान हो सकेगा।   भारत में  बनने  जा रहे स्मार्ट सिटी में सरकारी सेवाओ की कार्यप्रणाली, परिवहन एवं ट्रैफिक व्यवस्था, विद्युत एवं पानी व्यवस्था, मेडिकल सेक्टर की सेवाओं और कूड़े कचरे आदि के प्रबंधन को तकनीक की मदद से बेहतर बनाया जाएगा। सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग स्मार्ट सिटी में विधुत उपयोग एवं इसके वितरण को बेहतर बनाने, शहर की सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने, शहरो के बिज़नेस क्षेत्रो एवं कुछ खुले क्षेत्रो में वाई-फाई व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए किया जाएगा। 

स्मार्ट मीटर, क्लाउड कंप्यूटिंग तकनीक एवं वायरलेस सेंसर तकनीक की मदद से बिजली  खपत की व्यवस्था को बेहतर बनाना एवं इसका सही से प्रबंधन  करना संभव हो सकेगा। बिजली खपत जानने के लिए उपलब्ध स्मार्ट मीटर की मदद से बिजली प्रदानकर्ता और ग्राहक दोनों तरफ की सही सही जानकरी मिल सकेगी, जिसकी मदद से उपयोगकर्ता अपनी आवश्यकता के अनुसार ही बिजली खर्च कर पायेंगे। पावर प्लांट से शहरी  क्षेत्रो में बिजली भेजने  के लिए सामान्य पावर ग्रिड के स्थान पर पर 'स्मार्ट पावर ग्रिड' का उपयोग किया जाएगा। जिसकी मदद से न सिर्फ बिजली का सही प्रकार से वितरण हो सकेगा बल्कि कटौती के समय बिजली का संग्रहण भी संभव हो सकेगा एवं इसके परिचालन, प्रबंधन में आने वाले खर्च को भी कम किया जा सकेगा। स्मार्ट सिटी में सूचना एवं संचार तकनीक की मदद से सभी प्रकार के परिवहन नेटवर्क जैसे रेल, मेट्रो, बस, कार एवं अन्य को जोड़ा जा सकेगा, ताकि इनसे सम्बंधित जानकारी सही-सही मिल सके और शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सके।    

Friday, August 21, 2015

प्रेम बनाम विवाह

रचना त्रिपाठी
स्त्री हो या पुरुष- दोनों के जीवन में प्रेम का होना बहुत जरुरी है! प्रेम- यह वो संजीवनी है जिसे पाने की चाह शायद हर प्राणी में होती है। पर प्रेम में पागल होकर प्रेमी के साथ विवाह कर लेना बहुत समझदारी नहीं होती। क्योंकि प्रेम और विवाह दोनों की प्रकृति अलग-अलग है। इसलिए प्रेम को विवाह के खाके में फिट करना थोड़ा कठिन हो जाता है। तो जरुरी नहीं है कि जिससे प्रेम करें उससे विवाह भी करें। क्यों कि प्रेमविवाह में विवाह के बाद पवित्र प्रेम की जैसी आशा होती है वह कहीं न कहीं विवाह के पश्चात क्षीण होने लगती है।
देश की अदालत ने लिव-इन को क़ानूनी मान्यता भले ही दे दी हो, लेकिन हमारी सामाजिक बनावट ऐसी नहीं है जहाँ प्रेम करने वालों को शादी किये बिना विशुद्ध प्रेम की मंजूरी मिलती हो। इसलिए प्रेमीयुगल इस संजीवनी को पाने की चाह में प्रेम की परिणति विवाह के रूप में करने को मजबूर हो जाते हैं; और विवाह हो जाने के बाद वैसा प्रेम बना नहीं रह पाता। दूसरी तरफ हमारे समाज में ऐसे युगलों की भी बहुत बड़ी संख्या है जिनके जीवन में प्रेम का आविर्भाव ही शादी के बाद होता है। अरेंज्ड मैरिज की इस व्यवस्था को समाज में व्यापक मान्यता प्राप्त है। इसमें साथ-साथ पूरा जीवन बिताने के लिए ऐसे दो व्यक्तियों का गठबंधन करा दिया जाता है जो उससे पहले एक दूसरे को जानते तक नहीं होते। फिर भी अधिकांशतः इनके भीतर ठीक-ठाक आकर्षण, प्रेम और समर्पण का भाव पैदा हो जाता है। गृहस्थ जीवन की चुनौतियों का मुकाबला भी कंधे से कंधा मिलाकर करते हैं। संबंध ऐसा हो जाता है कि इसके विच्छेद की बात प्रायः कल्पना में भी नहीं आती। ऐसी आश्वस्ति डेटिंग करने वाले प्रेमी जोड़ों में शायद ही पायी जाती हो। वहाँ तो कौन जाने किस मामूली बात पर रास्ते अलग हो जाँय कह नहीं सकते। प्रेम उस मृगनयनी के समान है जिसे पाकर कोई भी फूला न समाये लेकिन शादीशुदा व्यक्ति के लिए है यह अत्यंत दुर्लभ है। यह मत भूलिए कि विवाह उस लक्ष्मण रेखा से कम नहीं जिससे बाहर जाने की तो छोड़िये ऐसा सोचना भी भीतर से हिलाहकर रख देता है।
विवाह के पश्चात् स्त्री पुरुष के बीच प्रेम का अस्तित्व वैसा नहीं रह जाता जैसा कि विवाह से पहले रहता है। प्रेम का स्वभाव उन्मुक्त होता है और विवाह एक गोल लकीर के भीतर गड़े खूंटे से बँधी वह परम्परा है जिसके इर्द गिर्द ही उस जोड़े की सारी दुनिया सिमट कर रह जाती है। फिर विवाह के साथ प्रेम का निर्वाह उसके मौलिक रूप में सम्भव नहीं रह जाता। प्रेम का विवाह के बाद रूपांतरण सौ प्रतिशत अवश्यम्भावी है। विवाह और प्रेम को एक में गड्डमड्ड कर प्रेमविवाह कर लेने वालों की स्थिति वेंटिलेटर पर पड़े उस मरीज की भाँति हो जाती है जिसकी नाक में हर वक्त ऑक्सीजन सिलिंडर से लगी हुई एक लंबी पाइप से बंधा हुआ मास्क लगा रहता है। यह प्रेम-विवाह में प्रेम-रस का वह पाइप होता है जिसपर यह संबंध जिन्दा रहता है। जिसके बिना चाहकर भी दूर जाने की सोचना खतरे को दावत देने जैसा है। सिलिंडर से लगी वह पाइप सांस लेने में सहायक तो जरूर बन जाती है पर वह स्वाभाविक जिंदगी नहीं दे पाती। अगर जिंदगी बची भी रह जाय तो शायद उसे उन्मुक्त होकर जीने की इजाजत न दे।