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Thursday, December 1, 2011

अंतरिक्ष में चीन की बढ़ती ताकत



अंतरिक्ष में चीन की बढ़ती ताकत

पिछले दिनों चीन ने मानव रहित अंतरिक्ष यान सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया है. चीन के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण अभियान है क्योंकि उसका उद्देश्य 2020 तक अपना पहला अंतरिक्ष स्टेशन बनाना है. अंतरिक्ष में स्टेशन स्थापित करने की तकनीक हासिल कर चीन ने अमेरिका और रूस की बराबरी कर लीहै, जिसके आर्थिक और सामरिक आयाम भी हैं। लेकिन यह चीन की महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा से भी प्रेरित है . 3 नवंबर को उसके द्वारा प्रक्षेपित किए गए मानवरहित अंतरिक्ष यान शेनझेउ-8 को पहले से वहां मौजूद अंतरिक्ष यान तियानगोंग-1 से जोड़ दिया गया। शेनझेउ-8 को एक नवंबर तथा तियानगोंग-1 को 28 सितंबर को प्रक्षेपित किया गया था। दोनों अंतरिक्ष यानों को जोड़ने की प्रक्रिया धरती की सतह से 343 किलोमीटर से अधिक की ऊंचाई पर संपन्न हुई। इस सफलता का चीन में सरकारी टेलीविजन पर प्रसारण किया गया। इस उपलब्धि पर चीन के राष्ट्रपति हू जिनताओ ने कहा कि अंतरिक्ष में यान को जोड़ने में मिली सफलता तीन चरणों वाले मानवयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिहाज से अहम है।


29 सितंबर को चीन ने अंतरिक्ष युग के एक नये अध्याय की शुरुआत की. इस दिन उसने अपनी पहली अंतरिक्ष प्रयोगशाला तियांगोंग-1 के पहले मॉड्यूल को अंतरिक्ष में स्थापित किया. चीन के इस मिशन को अंतरिक्ष की दुनिया में रूस और अमेरिका के वर्चस्व को तोड़ने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. रूसी अंतरिक्ष स्टेशन मीर के अवसान के बाद फ़िलहाल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन ( आइएसएस ) काम कर रहा है. अब बारी है चीनी अंतरिक्ष प्रयोगशाला तियांगोंग की.
चीन ने अपनी पहली अंतरिक्ष प्रयोगशाला तियांगोंग-1 को 29 सितंबर को अंतरिक्ष में भेजा. इसे गोबी मरुस्थल के जिउचुआन केंद्र से रॉकेट से लांच किया गया. रॉकेट उस प्रयोगशाला को प्रशांत महासागर के ऊपर ले गया. यह पृथ्वी से साढ़े तीन सौ किलोमीटर ऊपर है.
इस अंतरिक्ष प्रयोगशाला का नाम तियांगोंग रखा गया. चीनी भाषा में इसका मतलब होता है स्वर्ग की तरह महल. चीन के इस कदम से अंतरिक्ष की दुनिया को और भी बेहतर से समझने में मदद मिल सकती है.

खास डिजाइन, खास उद्देश्य

यह प्रयोगशाला लगभग साढ़े दस मीटर लंबा और बेलनाकार है. फ़िलहाल, यह मानवरहित है. लेकिन, चीनी अंतरिक्ष यात्रियों के अगले साल तक वहां जाने की संभावना है. इसके बाद से चीनी अंतरिक्षयात्री वहां काम कर सकेंगे. फ़िलहाल, इस मॉड्यूल को स्वायत्त रूप में ही रखा जायेगा और उस पर जमीन से ही नजर रखी जायेगी. फ़िर कुछ हफ्तों के बाद 3 नवम्बर को चीन ने एक और मानवरहित अंतरिक्षयान शेंजू-8 छोड़ा . इसके बाद  दोनों के बीच सफलतापूर्वक   संबंध स्थापित हो गया है . अब अगर उस कक्षा में कोई बड़ा ढांचा बनाना है, तो इस तरह की क्षमता का होना जरूरी है.
तियांगोंग-1 के मुख्य डिजाइनकर्ता यांग होंग के मुताबिक, अंतरिक्ष यान छोड़ने और वहां डॉकिंग करने के लिए काफ़ी अच्छी प्रौद्योगिकी चाहिए और चीन को अपना अंतरिक्ष स्टेशन भी बनाना है. चीन ने इस दशक के अंत तक उस अंतरिक्ष स्टेशन विकसित करने का लक्ष्य रखा है. चीन इस प्रयोगशाला के जरिये सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण विज्ञान यानी माइक्रोग्रेविटी साइंस, अंतरिक्ष विकिरण, जीव-विज्ञान एवं खगोलशास्त्र का अध्ययन करना चाहता है.

क्या है भविष्य की रणनीति

शेंजू-8 अभियान की कामयाबी के बाद  2012 में दो मानवयुक्त अभियान शेंजू-9 और 10 छोड़े जायेंगे. चीनी अंतरिक्षयात्री एक बार में दो से तीन की संख्या में जायेंगे और वे अंतरिक्ष संबंध स्थापित कर चुके अंतरिक्ष यान और प्रयोगशाला में दो हफ्ते तक रुकेंगे. इस अंतरिक्ष स्टेशन का वजन यूं तो 60 टन ही होगा, जो अमेरिका, रूस, यूरोप और जापान के 400 टन वाले मौजूदा संयुक्त अंतरिक्ष स्टेशन के मुकाबले कहीं कम होगा, लेकिन अंतरिक्ष में इसकी मौजूदगी ही अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि होगी.
इस स्टेशन की जो परिकल्पना है, उसमें मुख्य मॉड्यूल का वजन 20 से 22 टन के बीच होगा, जिसके साथ दो अपेक्षाकृत छोटे प्रयोगशाला वाले यान लगे होंगे. इस मिशन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर अभी ईंधन, खाने-पीने के सामान, हवा, पानी और अन्य अतिरिक्त सामान जिस तरह से पहुंचाया और रखा जाता है, वैसे ही चीनी अंतरिक्ष स्टेशन में भी होगा. यानी वे सारी सुविधाएं इनमें होंगी, जिनकी जरूरत होगी. उन्होंने बताया कि तियांगोंग का दो साल का जीवन है. इसके बाद दूसरी और जरूरत हुई तो तीसरी प्रयोगशाला भी भेजी जायेगी. चीन का कहना है कि उनके अभियान के अंत में मॉड्यूल को वातावरण नष्ट होने के लिए छोड़ दिया जायेगा और वह प्रशांत महासागर के एक अलग-थलग से हिस्से में जाकर नष्ट हो जायेगा. चीन अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में अरबों डॉलर लगा रहा है. उसका अंतरिक्ष विज्ञान कार्यक्रम काफ़ी जोर-शोर से चल रहा है. इसके तहत चंद्रमा के इर्द-गिर्द चक्कर काटने वाले उपग्रह छोड़े गये थे. एक तीसरे अभियान के तहत चंद्रमा की सतह की जांच के लिए एक रोबोट जैसा यंत्र भेजा जायेगा. चीन इसके साथ ही अपना सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम भी लाने जा रहा है. चीन और बड़े रॉकेट भी ला रहा है, लांग मार्च-5 नाम का रॉकेट पृथ्वी की नीचे की कक्षा में 20 टन तक का यान ले जा सकेगा. बता दें कि चीन ने अंतरिक्ष से जुड़ा अभियान तीन चरणों का बनाया है. उसमें तियांगोंग दूसरा चरण है.
प्रथम चरण में शेंजू कैप्सूल प्रणाली विकसित की गयी थी, जिसमें अब तक छह चीनी लोग 2003 से अब तक अंतरिक्ष की कक्षा में जा चुके हैं. यह चीन के लिहाज से एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी. इसके बाद अंतरिक्ष में चलने और वहां यान की डॉकिंग के लिए प्रौद्योगिकी की जरूरत थी और यही प्रक्रिया अब चल रही है. इसके बाद अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण कार्य शु हो जायेगा.

चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत

चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन के तहत आता है. वहीं, अंतरिक्ष की दुनिया में चीन ने 1950 से कदम रखा. इस साल चीन ने अमेरिकी खतरों को देखते हुए बैलेस्टिक मिसाइल प्रोग्राम की शुरुआत की. हालांकि, पहला चीनी फ्लाइट प्रोग्राम इसके कुछ दशक बाद ही शुरू हो सका, जब चीन ने 2003 में शेंजू-5 को अंतरिक्ष में भेजा.
इस सफ़लता के साथ ही चीन अंतरिक्ष में मानव को भेजने वाला तीसरा देश बन गया. इससे पहले रूस और अमेरिका ऐसा कारनामा दिखा चुके थे. अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत के पीछे चीन का मुख्य मकसद पृथ्वी के अध्ययन के लिए दीर्घकालीन व्यवस्था बनाना, स्वतंत्र टेलीकम्युनिकेशन नेटवर्क बनाना, व्यावसायिक लांच सिस्टम मुहैया कराना, अंतरिक्ष विज्ञान जैसे माइक्रोग्रेविटी, अंतरिक्ष पदार्थ ओद का अध्ययन करना. चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रम को माओ जेंडोंग की देन माना जाता है. कोरियन युद्ध के वक्त अमेरिकी खतरे को देखते हुए माओ ने इसकी शुरुआत की नींव रखी. जिसे काफ़ी अरसे बाद विकसित किया गया और अब चीन ने अंतरिक्ष में अपनी प्रयोगशाला भी स्थापित कर ली है.

कार्यक्रम के तीन चरण

चीन ने अंतरिक्ष से जुड़े अभियानों को तीन चरणों में बनाया है.
पहला : शेंजू कैप्सूल प्रणाली का विकास
दूसरा : अंतरिक्ष में चलने और डॉकिंग की प्रौद्योगिकी
तीसरा : अंतरिक्ष केंद्र का निर्माण ( चीन का लक्ष्य इस दशक के अंत तक इस काम पूरा करना है )

चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रमों की सूची देखने से पता चलता है कि आने वाले समय में वह इस मामले में अमेरिका और रूस की बराबरी करना चाहता है या उससे आगे निकल जाना चाहता है। इसके लिए वहां की सरकार अंतरिक्ष अनुसंधान पर हर साल औसतन दो अरब अमेरिकी डॉलर की भारी राशि खर्च कर रही है। "सेनझू' श़ृंखला के शुरुआती पांच यानों पर ही वह अब तक 2.4 अरब अमेरिकी डॉलर (19 अरब यूआन) खर्च कर चुका है। सच तो यह है कि "सेनझू-8' चीन के लंबे और महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रमों की एक कड़ी मात्र है, जिसे मुकाम तक पहुंचाने के लिए आने वाले समय में चीन इस तरह के कई और परीक्षण करेगा। दरअसल, सन् 2020 तक चीन सुदूर अंतरिक्ष में अपना एक स्वतंत्र स्थायी अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना चाहता है, जिसके लिए डॉकिंग प्रौद्योगिकी की उसे सख्त आवश्यकता थी। चीन का दावा है कि 2025 तक वह चंद्रमा की सतह पर अपने अंतरिक्ष यात्री को उतारने में कामयाब होगा। तीन साल बाद ही चीन का मंगल अभियान भी चालू हो जायेगा, जो सन् 2033 तक चलेगा। गौरतलब है कि चीन ने दो साल पहले अपनी देसी तकनीक के सहारे चंद्रमा पर यान भेजने में सफलता प्राप्त की थी। इसके उलट अमेरिका और रूस सन् 2020 तक अपने अंतरिक्ष स्टेशनों को समुद्र में गिरा देने की बात कर रहा है।इसमें कोई संदेह नहीं कि "सेनझू-8' यान की सफलता एक विशुद्ध वैज्ञानिक घटना है, जिसे चीनी वैज्ञानिकों ने वर्षों की मेहनत और प्रतिबद्धता के बल पर हासिल की है। लेकिन इसकी चर्चा विज्ञान से ज्यादा राजनीतिक हलकों में हो रही है। अमेरिका समेत तमाम विकसित देश इसे कूटनीतिक नजरिये से देख रहे हैं। कई राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि चीन अपने अतिखर्चीले अंतरिक्ष अनुसंधानों के जरिये यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि वह अब आर्थिक ही नहीं, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के मामले में भी "महाशक्ति' है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी "नासा' के प्रशासक माइक ग्रिफिन कहते हैं, "चीन बहुत सोच-समझकर अंतरिक्ष अनुसंधान चला रहा है। इस क्षेत्र में भारी धन खर्च कर वह उस दर्जा को प्राप्त करना चाहता है जिसे कूटनीतिक भाषा में महाशक्ति कहते हैं।' हालांकि चीन बार-बार दोहराता रहा है कि उसका अंतरिक्ष कार्यक्रम शांति और विकास के लिए है, लेकिन महाशक्ति कहलाने से भी उसे परहेज नहीं है।
शशांक द्विवेदी 

विश्व एड्स दिवस


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Wednesday, November 30, 2011

घातक है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश


देश के लिए घातक है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
पिछले दिनों केंद्रीय कैबिनेट ने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) को मंजूरी दे दी। सरकार ने मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी तक और सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी तक एफडीआइ के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी . सरकार के इस निर्णय के बाद केयरफोर, वालमार्ट, टेस्को व टारगेट जैसी कंपनियाँ भारत में अपने सुपर स्टोर खोलने में समर्थ होंगी। सरकार ने सिंगल ब्रांड में ५१ प्रतिशत  एफडीआई की सीमा भी हटा ली है। इससे एडिडास, गुस्सी, हर्मेस, कोस्टा कॉफी जैसे ब्रांड भारत में अपने कारोबार के पूर्ण मालिक होंगे।
सरकार के इस फैसले से वालमार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ देश के १० लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में मेगा स्टोर खोल सकेंगी। रिटेल सेक्टर में निवेश की दृष्टि से भारत दुनिया का सबसे आकर्षक बाजार है। भारतीय खुदरा बाजार का आकार देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग १० फीसद है। रोजगार देने के मामले में कृषि के बाद यह क्षेत्र दूसरे नंबर पर है। देश के सकल रोजगार का लगभग आठ फीसद खुदरा कारोबार क्षेत्र से आता है। नेशनल इकानॉमिक सर्वे के मुताबिक देश में खुदरा कारोबार के क्षेत्र में लगभग डेढ़ करोड़ दुकानें हैं।

मल्टी ब्रांड खुदरा कारोबार में सरकार ने एफडीआई को लेकर जो फैसला किया है, वह कुछ और नहीं बल्कि घरेलू खुदरा कारोबार को पूंजीवाद के कड़े शिकंजे में लेने का ही एक जरिया है। कुल मिलाकर यह देसी खुदरा कारोबारियों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देगा । यह केवल कारोबारियों को ही नुकसान नहीं पहुंचाएगा बल्कि किसानों, ट्रांसपोर्टर, कामगारों और खुदरा कारोबार से जुड़े कई अन्य पक्षों के लिए घातक साबित होगा। 

वैश्विक रिटेलरों का मकसद बाजार में उतरते ही ज्यादा से ज्यादा बाजार हिस्सेदारी हासिल करना होगा। उनकी आउटसोर्सिंग क्षमताओं, संसाधनों और सरकार के साथ नजदीकी को देखते हुए उनके लिए ऐसा करना बिलकुल भी मुश्किल नहीं होगा और जब एक बार वे बाजार पर काबिज हो जाएंगी तो फिर मनमाने तरीके से बाजार को चलाएंगी और लोगों से उलूल-जुलूल दाम वसूलेंगी। खुदरा कारोबार के मौजूदा ढांचे में बिचौलियों का दबदबा है और ग्राहक उत्पाद के लिए जो कीमत अदा करता है उसका केवल एक तिहाई ही किसान को मिलता है और बाकी फायदा बिचौलिये कमाते हैं। जब बिचौलियों की बात उठी है तो यह भी जानना जरूरी हो जाता है कि ये कौन लोग हैं। बैलगाड़ी चलाने वाले, ट्रांसपोर्टर, एजेंट और छोटे कारोबारी ये बिचौलिये हैं, वहीं वैश्विक दिग्गज कंपनियों के लिए ब्रांड ऐंबेसडर बिचौलियों का काम करते हैं जो कंपनियों से करोड़ों रुपये लेते हैं। इसके अलावा बिजली खपत, गोदाम और ट्रांसपोर्ट के उनके खर्चे भी बहुत ज्यादा होते हैं।

हमारे बिचौलिये न केवल अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं बल्कि देश के सामाजिक ढांचे को भी दुरुस्त रखने में मदद करते हैं। छोटे कारोबारियों पर जो दो-तिहाई मुनाफा बनाने का आरोप लगाया जा रहा है वह एकदम बेबुनियाद है। वर्ष 2005 से देश में बड़े कारोबारी घराने भी खुदरा कारोबार में शामिल हो गए हैं। अब जरा तुलना करें। उनके यहां उत्पादों के भाव या तो बाजार में चल रहे भावों के बराबर ही हैं या फिर उनसे भी ज्यादा हैं।

इस लिहाज से अगर दो तिहाई मुनाफे वाली बात लागू होती है तो उन पर ज्यादा लागू होती है। कुल मिलाकर कारोबारियों पर ज्यादा मुनाफा कमाने का आरोप केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इस बाजार में उतारने का एक जरिया मात्र है।
कैबिनेट के प्रस्ताव मुताबिक आने वाले 2-3 सालों में देश के अंदर एक करोड़ नई नौकरियां आ जाएंगी। सरकार यह भी कह रही है कि देश के अंदर लाखों डॉलर का विदेशी निवेश होगा। किसानों की आमदनी बढ़ेगी। आम लोगों को सस्ता सामान मिलेगा और महंगाई पर अंकुश लगेगा। लेकिन एक अहम सवाल यह है कि जब सरकार को इतनी समस्याओं का हल जादू की छड़ी के तौर पर रिटेल में एफडीआइ को मंजूरी दिया जाना ही था तो इसका संसद के अंदर और बाहर, सरकार में शामिल और विपक्ष के लोग इतना विरोध क्यों कर रहे हैं।
लेकिन हमें यह देखना होगा कि इस क्षेत्र में करोड़ों लोगों की आजीविका भी जुड़ी हुई है। उनका क्या होगा? वॉलमार्ट, कारफोर जैसी अरबों डॉलर का कोराबर करने वाली कंपनियां एक बड़े बैकअप प्लान के साथ भारत में आएंगी। वह इसलिए आएंगी, क्योंकि भारत 130 करोड़ लोगों का दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। जब उनके पास बैकअप के लिए पैसा ज्यादा होगा तो वे बड़े पैमाने में खरीददारी करेंगे और उसे सस्ती कीमतों पर बेचेंगे। वॉलमार्ट सरीखी कंपनियां दुनिया भर में यही कर रही हैं और अमेरिका में उसके खिलाफ कई बार आंदोलन हो चुका है। ऐसे में कुछ सालों के अंदर ही बाजार पर उनका एकाधिकार हो जाता है और उसके बाद वे ग्राहकों से मनमानी कीमत वसूलते हैं। जब वे एग्रेसिव मार्केटिंग के जरिए सस्ती कीमतों पर सामान बेचने लगेंगे तो छोटे मोटे रिटेल कारोबारी उनके सामने टिक नहीं पाएंगे। ऐसा नहीं है कि इन स्टोरों से आसपास की दुकानों पर असर नहीं पड़ा हो। मुंबई का एक अध्ययन बताता है कि बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स खुलने की वजह से आसपास की दुकानें बंद हो गई। देश के दूसरे शहरों में इस तरह का अध्ययन अभी नहीं हुआ है, लेकिन मुंबई के उदाहरण से डर जरूर पैदा होता है। दुकानदारों के अलावा अभी करोड़ों लोग रिटेल कारोबार में मिडिल मैन का काम करते हैं। बिचौलिए के तौर पर काम करने वाले लोग नकारात्मक मतलब वाली दलाली नहीं करते, बल्कि मेहनत करके आजीविका चलाते हैं। ऐसे लोगों का रोजगार छिन जाएगा, क्योंकि बड़े स्टोर सीधे किसानों से ही खरीददारी करेंगे। मतलब छह सात बिचौलिए की जगह एक बड़ा बिचौलिया आ जाएगा, जो कहीं ज्यादा मुनाफा लेगा। सस्ते सामान के चक्कर में ऐसे मल्टी स्टोर चीनी सामानों को प्राथमिकता देंगे। इससे भारत का घरेलू और हस्तशिल्प उद्योग पूरी तरह से खत्म हो सकता है। हालांकि 30 फीसदी सामान देश के स्थानीय छोटे उत्पादकों से खरीदना होगा, लेकिन बड़ी-बड़ी कंपनियां साम-दंड-भेद का सहारा लेकर ऐसे प्रावधानों को दरकिनार कर सकती हैं। जहां तक उपभोक्ताओं को सस्ते उत्पाद मिलने की बात है, वे सस्ता सामान कब तक खरीद पाएंगे। इसे लेकर आशंकाएं कम नहीं हैं।
सरकार को बहुब्रांड खुदरा कारोबार में एफडीआई को मंजूरी देने के बजाय मौजूदा खुदरा कारोबार के ढांचे को सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) की तर्ज पर विकसित करना चाहिए। सरकार को कम ब्याज दर पर कर्ज की सुविधा मुहैया करानी चाहिए। इससे खुदरा कारोबारियों को श्रृंखला बनाने में मदद मिलेगी जिसका ग्राहकों को भी फायदा मिलेगा।
शशांक द्विवेदी 

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Wednesday, November 23, 2011

Check out दो नौजवानों का एक अनूठा प्रयोग « जागरण मेहमान कोना

Check out दो नौजवानों का एक अनूठा प्रयोग « जागरण मेहमान कोना
dainik jagran article on 23nov11..

गरीबी पर प्रयोग


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शशांक द्विवेदी