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Wednesday, November 30, 2011

घातक है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश


देश के लिए घातक है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
पिछले दिनों केंद्रीय कैबिनेट ने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) को मंजूरी दे दी। सरकार ने मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी तक और सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी तक एफडीआइ के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी . सरकार के इस निर्णय के बाद केयरफोर, वालमार्ट, टेस्को व टारगेट जैसी कंपनियाँ भारत में अपने सुपर स्टोर खोलने में समर्थ होंगी। सरकार ने सिंगल ब्रांड में ५१ प्रतिशत  एफडीआई की सीमा भी हटा ली है। इससे एडिडास, गुस्सी, हर्मेस, कोस्टा कॉफी जैसे ब्रांड भारत में अपने कारोबार के पूर्ण मालिक होंगे।
सरकार के इस फैसले से वालमार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ देश के १० लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में मेगा स्टोर खोल सकेंगी। रिटेल सेक्टर में निवेश की दृष्टि से भारत दुनिया का सबसे आकर्षक बाजार है। भारतीय खुदरा बाजार का आकार देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग १० फीसद है। रोजगार देने के मामले में कृषि के बाद यह क्षेत्र दूसरे नंबर पर है। देश के सकल रोजगार का लगभग आठ फीसद खुदरा कारोबार क्षेत्र से आता है। नेशनल इकानॉमिक सर्वे के मुताबिक देश में खुदरा कारोबार के क्षेत्र में लगभग डेढ़ करोड़ दुकानें हैं।

मल्टी ब्रांड खुदरा कारोबार में सरकार ने एफडीआई को लेकर जो फैसला किया है, वह कुछ और नहीं बल्कि घरेलू खुदरा कारोबार को पूंजीवाद के कड़े शिकंजे में लेने का ही एक जरिया है। कुल मिलाकर यह देसी खुदरा कारोबारियों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देगा । यह केवल कारोबारियों को ही नुकसान नहीं पहुंचाएगा बल्कि किसानों, ट्रांसपोर्टर, कामगारों और खुदरा कारोबार से जुड़े कई अन्य पक्षों के लिए घातक साबित होगा। 

वैश्विक रिटेलरों का मकसद बाजार में उतरते ही ज्यादा से ज्यादा बाजार हिस्सेदारी हासिल करना होगा। उनकी आउटसोर्सिंग क्षमताओं, संसाधनों और सरकार के साथ नजदीकी को देखते हुए उनके लिए ऐसा करना बिलकुल भी मुश्किल नहीं होगा और जब एक बार वे बाजार पर काबिज हो जाएंगी तो फिर मनमाने तरीके से बाजार को चलाएंगी और लोगों से उलूल-जुलूल दाम वसूलेंगी। खुदरा कारोबार के मौजूदा ढांचे में बिचौलियों का दबदबा है और ग्राहक उत्पाद के लिए जो कीमत अदा करता है उसका केवल एक तिहाई ही किसान को मिलता है और बाकी फायदा बिचौलिये कमाते हैं। जब बिचौलियों की बात उठी है तो यह भी जानना जरूरी हो जाता है कि ये कौन लोग हैं। बैलगाड़ी चलाने वाले, ट्रांसपोर्टर, एजेंट और छोटे कारोबारी ये बिचौलिये हैं, वहीं वैश्विक दिग्गज कंपनियों के लिए ब्रांड ऐंबेसडर बिचौलियों का काम करते हैं जो कंपनियों से करोड़ों रुपये लेते हैं। इसके अलावा बिजली खपत, गोदाम और ट्रांसपोर्ट के उनके खर्चे भी बहुत ज्यादा होते हैं।

हमारे बिचौलिये न केवल अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं बल्कि देश के सामाजिक ढांचे को भी दुरुस्त रखने में मदद करते हैं। छोटे कारोबारियों पर जो दो-तिहाई मुनाफा बनाने का आरोप लगाया जा रहा है वह एकदम बेबुनियाद है। वर्ष 2005 से देश में बड़े कारोबारी घराने भी खुदरा कारोबार में शामिल हो गए हैं। अब जरा तुलना करें। उनके यहां उत्पादों के भाव या तो बाजार में चल रहे भावों के बराबर ही हैं या फिर उनसे भी ज्यादा हैं।

इस लिहाज से अगर दो तिहाई मुनाफे वाली बात लागू होती है तो उन पर ज्यादा लागू होती है। कुल मिलाकर कारोबारियों पर ज्यादा मुनाफा कमाने का आरोप केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इस बाजार में उतारने का एक जरिया मात्र है।
कैबिनेट के प्रस्ताव मुताबिक आने वाले 2-3 सालों में देश के अंदर एक करोड़ नई नौकरियां आ जाएंगी। सरकार यह भी कह रही है कि देश के अंदर लाखों डॉलर का विदेशी निवेश होगा। किसानों की आमदनी बढ़ेगी। आम लोगों को सस्ता सामान मिलेगा और महंगाई पर अंकुश लगेगा। लेकिन एक अहम सवाल यह है कि जब सरकार को इतनी समस्याओं का हल जादू की छड़ी के तौर पर रिटेल में एफडीआइ को मंजूरी दिया जाना ही था तो इसका संसद के अंदर और बाहर, सरकार में शामिल और विपक्ष के लोग इतना विरोध क्यों कर रहे हैं।
लेकिन हमें यह देखना होगा कि इस क्षेत्र में करोड़ों लोगों की आजीविका भी जुड़ी हुई है। उनका क्या होगा? वॉलमार्ट, कारफोर जैसी अरबों डॉलर का कोराबर करने वाली कंपनियां एक बड़े बैकअप प्लान के साथ भारत में आएंगी। वह इसलिए आएंगी, क्योंकि भारत 130 करोड़ लोगों का दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। जब उनके पास बैकअप के लिए पैसा ज्यादा होगा तो वे बड़े पैमाने में खरीददारी करेंगे और उसे सस्ती कीमतों पर बेचेंगे। वॉलमार्ट सरीखी कंपनियां दुनिया भर में यही कर रही हैं और अमेरिका में उसके खिलाफ कई बार आंदोलन हो चुका है। ऐसे में कुछ सालों के अंदर ही बाजार पर उनका एकाधिकार हो जाता है और उसके बाद वे ग्राहकों से मनमानी कीमत वसूलते हैं। जब वे एग्रेसिव मार्केटिंग के जरिए सस्ती कीमतों पर सामान बेचने लगेंगे तो छोटे मोटे रिटेल कारोबारी उनके सामने टिक नहीं पाएंगे। ऐसा नहीं है कि इन स्टोरों से आसपास की दुकानों पर असर नहीं पड़ा हो। मुंबई का एक अध्ययन बताता है कि बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स खुलने की वजह से आसपास की दुकानें बंद हो गई। देश के दूसरे शहरों में इस तरह का अध्ययन अभी नहीं हुआ है, लेकिन मुंबई के उदाहरण से डर जरूर पैदा होता है। दुकानदारों के अलावा अभी करोड़ों लोग रिटेल कारोबार में मिडिल मैन का काम करते हैं। बिचौलिए के तौर पर काम करने वाले लोग नकारात्मक मतलब वाली दलाली नहीं करते, बल्कि मेहनत करके आजीविका चलाते हैं। ऐसे लोगों का रोजगार छिन जाएगा, क्योंकि बड़े स्टोर सीधे किसानों से ही खरीददारी करेंगे। मतलब छह सात बिचौलिए की जगह एक बड़ा बिचौलिया आ जाएगा, जो कहीं ज्यादा मुनाफा लेगा। सस्ते सामान के चक्कर में ऐसे मल्टी स्टोर चीनी सामानों को प्राथमिकता देंगे। इससे भारत का घरेलू और हस्तशिल्प उद्योग पूरी तरह से खत्म हो सकता है। हालांकि 30 फीसदी सामान देश के स्थानीय छोटे उत्पादकों से खरीदना होगा, लेकिन बड़ी-बड़ी कंपनियां साम-दंड-भेद का सहारा लेकर ऐसे प्रावधानों को दरकिनार कर सकती हैं। जहां तक उपभोक्ताओं को सस्ते उत्पाद मिलने की बात है, वे सस्ता सामान कब तक खरीद पाएंगे। इसे लेकर आशंकाएं कम नहीं हैं।
सरकार को बहुब्रांड खुदरा कारोबार में एफडीआई को मंजूरी देने के बजाय मौजूदा खुदरा कारोबार के ढांचे को सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) की तर्ज पर विकसित करना चाहिए। सरकार को कम ब्याज दर पर कर्ज की सुविधा मुहैया करानी चाहिए। इससे खुदरा कारोबारियों को श्रृंखला बनाने में मदद मिलेगी जिसका ग्राहकों को भी फायदा मिलेगा।
शशांक द्विवेदी 

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Wednesday, November 23, 2011

Check out दो नौजवानों का एक अनूठा प्रयोग « जागरण मेहमान कोना

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dainik jagran article on 23nov11..

गरीबी पर प्रयोग


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शशांक द्विवेदी 

Wednesday, November 2, 2011

अंतरिक्ष अभियान में कामयाबी की ओर बढ़ते कदम


अंतरिक्ष अभियान में कामयाबी की ओर बढ़ते कदम
अंतरिक्ष अभियान में एक और मील का पत्थर स्थापित करते हुए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान इसरो ने १२ अक्टूबर को श्री हरिकोटा से ध्रुवीय  उपग्रह प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी18से भारतीय-फ्रांसीसी उष्णकटिबंधीय मौसम उपग्रह मेघा-ट्रॉपिक्यूज और तीन अन्य छोटे उपग्रहों को प्रक्षेपण करने में सफलता हासिल की है । साल 1993 के बाद से यह 50वां उपग्रह प्रक्षेपण है। प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी18 44 मीटर लंबा है और इसका भार 230 टन है। रॉकेट के साथ 1,000 किलोग्राम भार का मेघा ट्रॉपिक्यूज उपग्रह व 42.6 किलोग्राम भार के तीन छोटे उपग्रह अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए गए ।
मेघा ट्रॉपिक्यूज को उष्णकटिवंधीय क्षेत्रों की जलवायु व पर्यावरण में होने वाले बदलावों के अध्ययन के लिए प्रक्षेपित किया गया  है। इसके साथ ही भारत इस तरह का अंतरिक्ष मिशन शुरू करने वाला दुनिया का दूसरा राष्ट्र बन जाएगा। यह उपग्रह पृथ्वी की कक्षा से 800 किलोमीटर नीचे दिखेगा। उम्मीद की जा रही है कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) को भी मौसम का अधिक सटीक पूर्वानुमान बताने में इससे मदद मिलेगी। तीन अन्य छोटे उपग्रहों में चेन्नई के नजदीक स्थित एसआरएम विश्वविद्यालय के छात्रों का बनाया 10.9 किलोग्राम भार का एक उपग्रह एसआरएमसैट है। दूसरा तीन किलोग्राम का दूरसंवेदी उपग्रह जुगनू है,जिसे  भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर ने बनाया है। इनके अलावा लक्जमबर्ग का 28.7 किलोग्राम का वैसलसैट उपग्रह है जो  समुद्र में जहाजों की स्थिति ज्ञात करने के लिए इसे प्रक्षेपित किया गया है ।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के छात्रों के दल द्वारा तैयार नैनो उपग्रह जुगनू का निर्माण और  प्रक्षेपण एक चुनौती था । इस उपग्रह को तैयार करने में सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करने की थी कि इसे प्रक्षेपण के बाद निर्बाध ढंग से ऊर्जा कैसे प्राप्त हो सके और संचार व्यवस्था की दुरुस्त तरकीब कैसे बने। इसके साथ ही नियंत्रण व्यवस्था का उचित प्रबंध एक अहम विषय था। जुगनू  आठ सेंटीमीटर चौड़ा और 30 सेंटीमीटर लम्बा सूक्ष्म उपग्रह है, जिसके माध्यम से बाढ़, सूखा, आपदा प्रबंधन और दूरसंचार से जुड़े विषयों पर सूचनाएं एकत्र की जा सकेंगी। वास्तव में इतने छोटे उपग्रह को तैयार करना एक बड़ी चुनौती थी, जिसे आइआईटी कानपुर के करीब 40 छात्रों के दल ने सफलतापूर्वक बनाया। करीब 2.5 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस उपग्रह के विषय में उन्होंने कहा कि इस उपग्रह में माइक्रो इमेजिंग कैमरा लगा है, जिससे बाढ़, सूखा और अन्य आपदाओं के बारे में सुस्पष्ट चित्र लिये जा सकें। यह उपग्रह जीपीएस प्रणाली से युक्त है। किसी भी उपग्रह का भार मुख्य रूप से उसके पेलोड पर निर्भर करता है। इसको ध्यान में रखते हुए आईआईटी के छात्रों ने नया कैमरा डिजाइन किया है जिसमें योजनाबद्ध प्रारूप डाला गया है।

मानसून की गुत्थी सुलझाएगा मेघा ट्रॉपिक्स
मानसून के पूर्वानुमान को लेकर नयी कोशिशें हमेशा से होती रही हैं. कभी परंपरागत तकनीक की मदद ली गयी, तो कभी कृत्रिम उपग्रहों के जरिए मानसून की भविष्यवाणी की कोशिश की गयी. हाल में इसरो ने फ्रांस के सहयोग से निर्मित मेघा-ट्रॉपिक्स उपग्रह का प्रक्षेपण किया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि मेघा से मानसून की सटीक भविष्यवाणी करने मदद मिलेगी.
हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब भारत ने मौसम या मानसून की जानकारी पाने के लिए कोई उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा है. इससे पहले भी इस मकसद से भारत कई उपग्रहों का प्रक्षेपण कर चुका है. लेकिन, कहा जा रहा है कि मेघा-ट्रॉपिक्स मानसून पूर्वानुमान में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाला साबित होगा. इससे किसानों को काफ़ी मदद मिलेगी.
उपग्रह प्रक्षेपण के इतिहास में एक नया कीर्तिमान रचते हुए भारत के पीएसएलवी-सी 18 राकेट ने सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से भारत-फ्रांसीसी उपग्रह मेघा-ट्रॉपिक्स को कक्षा में सफ़लतापूर्वक स्थापित कर दिया है. इस उपग्रह से मानसून के मिजाज को समझने में काफ़ी मदद मिलेगी. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ( इसरो ) के मुताबिक, इस उपग्रह से मानसून की सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है.

मानसून की सही भविष्यवाणी करने की कोशिश काफ़ी पहले से ही जारी है. इसके लिए अब तक कई उपग्रह भी अंतरिक्ष में छोड़े जा चुके हैं. आइए सबसे पहले जानते हैं कि कि ओखर मानसून पूर्वानुमान का क्या इतिहास रहा है और पहले इसका पूर्वानुमान किस तरह किया जाता था.
मानसून पूर्वानुमान का इतिहास
मानसून अरबी शब्द मौसिम से बना है. इसका मतलब होता है, हवाओं का बदलने वाला मिजाज. मानसून का इतिहास काफ़ी पुराना है. 16वीं शताब्दी में मानसून शब्द का सबसे पहले प्रयोग समुद्र मार्ग से होने वाले व्यापार के संदर्भ में हुआ. तब भारतीय व्यापारी शीत ऋतु में इन हवाओं के सहारे व्यापार के लिए अरब और अफ्रीकी देशों में जाते थे और ग्रीष्म ऋतु में अपने देश लौटते थे.
शीत ऋऋतु में हवाएं उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती हैं, जिसे शीत ऋतु का मानसून कहा जाता है. ग्रीष्म ऋतु में यह इसके विपरीत बहती हैं. इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून या गर्मी का मानसून कहा जाता है. इन हवाओं से व्यापारियों को नौकायन में सहायता मिलती थी. इसलिए इन्हें एक किस्म का ट्रेड विंड भी कहा जाता है.
कैसा लगाया जाता है पूर्वानुमान
मानसून की अवधि 1 जून से 30 सितंबर यानी चार महीने की होती है. हालांकि, इससे संबंधित भविष्यवाणी 16 अप्रैल से 25 मई के बीच कर दी जाती है. मानसून की भविष्यवाणी के लिए भारतीय मानसून विभाग 16 तथ्यों का अध्ययन करता है. इन 16 तथ्यों को चार भागों में बांटा गया है. सारे तथ्यों को मिलाकर मानसून के पूर्वानुमान निकाले जाते हैं. पूर्वानुमान निकालते समय तापमान, हवा, दबाव और बर्फ़बारी जैसे विभिन्न कारकों का ध्यान रखा जाता है.
पूरे भारत के विभिन्न भागों के तापमान का अलग-अलग अध्ययन किया जाता है. मार्च में उत्तर भारत का न्यूनतम तापमान और पूर्वी समुद्री तट का न्यूनतम तापमान, मई में मध्य भारत का न्यूनतम तापमान और जनवरी से अप्रैल तक उत्तरी गोलार्ध की सतह का तापमान नोट किया जाता है. तापमान के अलावा हवा का भी अध्ययन किया जाता है.       
वातावरण में अलग-अलग महीनों में छह किलोमीटर और 20 किलोमीटर ऊपर बहने वाली हवा के रुख को नोट किया जाता है. इसके साथ ही वायुमंडलीय दबाव भी मानसून की भविष्यवाणी में अहम भूमिका निभाता है. वसंत ऋतु में दक्षिणी भाग का दबाव और समुद्री सतह का दबाव, जबकि जनवरी से मई तक विषुवतीय हिंद महासागर के दबाव को मापा जाता है.
इसके बाद बर्फ़बारी का अध्ययन किया जाता है. जनवरी से मार्च तक हिमालय के खास भागों में बर्फ़ का स्तर, क्षेत्र और दिसंबर में यूरेशियन भाग में बर्फ़बारी का अध्ययन मानसून की भविष्यवाणी में अहम किरदार निभाता है. इन सभी तथ्यों के अध्ययन के लिए आंकड़े उपग्रह द्वारा इकट्ठा किये जाते हैं. फ़िर, अनुमान के आधार पर मानसून के बारे में बताया जाता है.
पूर्वानुमान की राह में क्या हैं दिक्कतें
उपग्रह से मिले आंकड़ों की जांच-पड़ताल में थोड़ी-सी असावधानी या मौसम में किसी प्राकृतिक कारणों से बदलाव का असर मानसून की भविष्यवाणी पर पड़ता है. उदाहरण के तौर पर, साल 2004 में प्रशांत महासागर के मध्य विषुवतीय क्षेत्र में समुद्री तापमान जून के महीने में बढ़ गया. इस कारण 2004 में मानसून की भविष्यवाणी पूरी तरह सही न हो पायी.
                                                  
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kalptaru express article on Technical Education (on IIT)