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Thursday, March 21, 2013

मदर टेरेसा के अनमोल विचार


उज्ज्वल पाठ 

''अकसर लोग अविवेकी, कुतर्की और आत्मकेंद्रित होते हैं, फिर भी उन्हें माफ करते रहना। अगर तुम दयालु हो तो लोग तुम पर स्वार्थी होने और परोक्ष मंतव्य रखने का दोष लगाएंगे; कुछ भी हो जाए, तुम दयालुता न छोड़ना! अगर तुम सफल हो, तुम्हें कुछ झूठे दोस्त और कुछ सच्चे शत्रु मिल जाएंगे; कुछ भी हो, पर तुम सफलता की राह पर बढ़ते रहना! अगर तुम ईमानदार और उन्मुक्त हो, लोग तुम्हें धोखा दे सकते हैं; कुछ भी हो, तुम ईमानदार और मुक्त ही होना! जिसे बनाने में तुम्हें वर्षों लगे, कोई उसे रात भर में नष्ट कर सकता है; कुछ भी हो, निर्माण में लगे रहना। अगर तुम्हें शांति और आनंद मिले तो उन्हें ईर्ष्या हो सकती है; फिर भी प्रसन्न बने रहना। आज तुम जो भला करते हो, लोग अक्सर उसे कल ही भूल जाएंगे; फिर भी अच्छा ही करते रहना। जो तुम्हारे पास है, उसका सर्वश्रेष्ठ संसार को देना। वह कभी पर्याप्त नहीं होगा; फिर भी संसार को अपना सर्वश्रेष्ठ ही देना!''




कुछ यादें इंजीनियरिंग और लेखन से जुड़ी हुई


पिछले 3 सालों में लेखन के क्षेत्र में मैंने अपने बहुत सारे सपने पूरे किये जो मै बचपन में देखता था .अखबार का सम्पादकीय पेज ही मुझे सबसे ज्यादा प्रिय था क्योंकि वही पेज सभी संस्करणों में बदलता नहीं था .शहरों के हिसाब से खबरों वाले पेज बदल जाते थे ,बस तभी निश्चय कर लिया था कि बस इसी पेज के लिए लिखना है .बहुत कम उम्र में (लगभग २१ वर्ष ) बी टेक करते समय ही देश के कई प्रमुख अखबारों दैनिक जागरण ,अमर उजाला ,जनसत्ता ,दैनिक आज ,स्वतंत्र प्रभात आदि  में मेरे लेख संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुए तो आत्मविश्वास बहुत ज्यादा बढ़ गया .सपने पूरे होने लगे ,उम्मीदों को नए पंख लग गए .इसी दौरान अमर उजाला ,आगरा में विज्ञान और तकनीक से सम्बंधित कॉलम "साइबर बाइट्स " नियमित रूप से लिखने का अवसर मिला .ये कॉलम सप्ताह में तीन बार प्रकाशित हुआ ,काफी अच्छा लगा और प्रसिद्धि भी मिली ,नए लोगों से जुड़ा .अमर उजाला में काम करने के दौरान ही मेरी मुलाक़ात प्रियंका से हुई  जो  वही पर सब एडीटर थी  .मिला तो लगा कि बस यही है जिसकी मुझे तलाश थी कुछ मुलाकातों में ही प्यार परवान चढ़ा और हमारी शादी हो गयी .इसी समय एक राष्ट्रीय स्तर की तकनीकी पत्रिका टेक्नीकल टुडे से जुड़ा .संदीप शर्मा के साथ मिलकर हम इन्जीनियरिंग के छात्रों ने इस पत्रिका को निकाल कर और सफल बनाकर बहुत बड़ा काम किया .उस समय लगा कि एक टीम के साथ मिलकर बड़ा काम किया जा सकता है .बाद में प्रकाशन की दिक्कतों और अनुभव की कमी के कारण इस प्रोजेक्ट को हमें पोस्टपोन करना पड़ा .उस समय भी टूटे नहीं ,झुके नहीं ,न ही इस पत्रिका को हमने व्यासायिक हाँथों में बिकने दिया जबकि उस समय टेक्नीकल टुडे को लेकर कई बड़े प्रस्ताव हमारे पास आये .क्रमशः..जारी