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Tuesday, May 21, 2013

बसपा का नव ब्राह्मण वाद


शशांक द्विवेदी 
राजनीति भी अजब-गजब चीज है कुछ भी करवा सकती है .मुझे आज भी याद है ९० के दशक में जब मै 10 वी,12 वी में था मायावती और कांशीराम की रैलियों में हमेशा सवर्ण विरोधी नारे लगते थे ,तिलक ,तराजू और तलवार इनको मारों ......असल में बसपा की नींव ही सवर्ण विरोध पर ही थी .लेकिन आज देखिये वक्त बदला और सत्ता के लिए उन्ही मायावती ने लोकसभा की घोषित 36 में 19 सीटों पर ब्राह्मणों को टिकट दे दिया .पिछले विधान सभा में भी बसपा में जमकर सवर्णों को टिकट बाटें थे .दलितों को मुर्ख बनाकर मायावती जो कर रही है वो शायद दलित चिंतकों को न दिख रहा है न वो देखना चाहते है .वो सिर्फ अपने स्तर पर सवर्णों को गरिया रहें है जबकि उनकी सुप्रीमों इन्ही दबंग सवर्ण सांसद –विधायकों के हाथो खेल रही है .सवर्णों के लिए खासकर ब्राह्मणों के लिए तो बसपा सबसे मुफीद पार्टी है ,पैसे दो टिकट लो फिर सांसद –विधायक बनकर गुंडई करो ,दबंगई करो ,उन्ही दलितों पर अत्याचार करों जिनकी एकमात्र घोषित मसीहा मायावती है . अब तो ये नारा लगने लगा कि “ब्राह्मण संख बाजयेगा हाथी दिल्ली जाएगा ..”अभी तो सिर्फ 36 के ही टिकट घोषित हुए है 44 के तो अभी और होने है देखते जाइए अभी वो क्या क्या करती है .ये सब देखकर ये तो समझ में आ रहा है कि पहले किसी जाति विशेष की राजनीति करो फिर जब सत्ता का सुख मिल जाए तो उसी जाति विशेष के हितों पर सबसे ज्यादा कुठाराघात करो ..देश /प्रदेश के कथित दलित चिंतक क्या कर रहें है क्या उन्हें ये सब दिखाई नहीं दे रहा है (कोई खुल कर बोल नहीं रहा है )या वो सब भी मायावती की तरह ही सोचने लगे है ..मायावती के टिकट बटवारे को देखकर सांसद बनने की इच्छा जोर पकड़ रही है समस्या सिर्फ एक है टिकट खरीदने के लिए इतने ज्यादा पैसे नहीं है ..अगर आप लोग मदत करें तो सांसद बनना तय है ....कुल मिलाकर आजादी के बाद सवर्णों के लिए सांसद –विधायक बनने का सबसे मुफीद मौका है सपा –बसपा दोनों ही उन्हें जमकर टिकट देने को तैयार दिख रही है ..कुल मिलाकर राजनीति में कुछ भी हो सकता है!!!

Sunday, May 12, 2013

हिंदी साहित्य के लाबीस्ट

मनीषा कुलश्रेष्ठ से बड़ा लाबीस्ट हिंदी साहित्य के क्षेत्र में कोई नहीं है ..आप उनकी सिर्फ तारीफ़ करें तभी वह खुश रहती है ,अगर उनकी थोड़ी भी आलोचना कर दे तो वो बौखला जाती है ..हो सकता है वो तकनीकी रूप से लेखिका हो लेकिन विचारों ,इंसानियत के स्तर पर तो बेहद घमंडी ,संवेदनहीन ,सिर्फ चापलूसी ,तारीफ पसंद करने वाली है ..हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में उनका जो भी स्थान है वो सिर्फ चापलूसी ,चुगलखोरी और लाबिंग की वजह से है ..लेखक या लेखिका के लिए पहली और अनिवार्य शर्त उसमे इंसानियत /मानवता का होना है अगर उसमे ये तत्व नहीं है तो ऐसे लोगों को क्या कहूँ ..बस ज्यादा कहना नहीं चाहता ...मनीषा कुलश्रेष्ठ के शब्दों ,लेखों और रचनाओं पर ना जाइये वो बिना किसी मानवीय भावना के लिखी जाती है जहाँ सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ तत्व की प्रधानता होती है ..जब तक आप उनकी तारीफ,चापलूसी करेंगे बस तभी तक वो आप के साथ है नहीं तो सिर्फ उनका झूठा घमंड ,बौखलाहट यानी उनका असली चेहरा ...