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Tuesday, January 21, 2014

मोरल फोबिया मिटाने के नाम पर

देखते-देखते हमारा समाज ग्लोबल सेक्स इंडस्ट्री के चक्रव्यूह में जा फंसा है 
प्रभु जोशी 
एड्स को लगभग मृत्यु का पर्याय बताते हुए उससे बचने के लिए जिस तरह कंडोम-प्रमोशन कार्यक्रम भारत में चलाया गया, उसने भारतीय समाज में सेक्स को इतना पारदर्शी बना दिया कि यौन-उद्योग के भारत में पदार्पण की संभावनाएं खड़ी हो गईं। आज दुनिया भर में पोर्न के पंसारी फैल चुके हैं और हमारी युवा पीढ़ी में तो पोर्न क्लिप्स एक किस्म का सांस्कृतिक आदान-प्रदान बन गई हैं। यह बदलाव अचानक और अपने आप नहीं आया है। हमारे देखते-देखते विज्ञापनों में एक नया नाको-निर्मित टेलीजेनिक बाप पैदा हो गया जो अपने आधुनिक बेटे की जींस की जेब में कंडोम रखते हुए एक महान पैतृक दायित्व की पूर्णता में मुस्कुराने लगा। क्लोज शॉट में मांएं भी अपनी स्मार्ट पुत्री को सुरक्षा की सलाह देती हुई बरामद होने लगीं। युवा की छवि में जींस, गॉगल्स, मोबाइल के साथ अब कंडोम का होना भी अनिवार्य हो गया। कंडोम को काउंटर पर खरीदने में सांस्कृतिक-संकोच वाला प्रौढ़ मूर्ख सिद्ध हुआ और धड़ल्ले से बेधड़क होकर मनचाहा ब्रांड मांगने वाला युवक अग्रगामी। 
कुल मिलाकर कंडोम प्रमोशन अभियान ने भारतीय परंपरागत समाज में सेक्स को इतना खुला बना दिया कि क्लासमेट सेक्समेट में बदलने लगे। युवाओं से पूछे जाने पर कि क्या वे सेक्स पर बात कर रहे हैं- 'डू यू टॉक अबाउट सेक्स'- उत्तर आया 'नो, वी डू नॉट... वी डू इट।' इस पर टेलीविजन केंद्र पर आमंत्रित युवाओं ने तालियां दीं। उनकी इन तालियों को तमाचों की तरह व्याख्यायित किया जाने लगा, जो सामाजिक निषेधों के गाल पर पड़ रहे थे। लक्ष्मण रेखा शब्द का हवाला देने वाला हवाला कांड का सा अपराधी हुआ। उसके हलक में हाथ डालकर उसकी जीभ बाहर निकालने के लिए, युवाओं में आक्रामकता भरी जाने लगी। परिवार में युवा, स्वतंत्र नहीं स्वच्छंद हुआ। वह घर का सदस्य नहीं बल्कि एक ही छत के नीचे अन्य सदस्यों के साथ रहने वाला मार्केट-फ्रेंडली इंडिविजुअल में बदल गया। उसका मोबाइल उसका टॉप उसकी जींस उसकी लिबर्टी उसकी प्रायवेसी। कुल मिलाकर निजता की मांग परिवार-विरोधी बनी। 
कहना न होगा कि 'डांसिंग नेकेड इन द माइंड फील्ड' का सच अब भारतीय युवा पीढ़ी का सच है, क्योंकि कंडोम ने भारतीय सांस्कृतिक तलघर का ताला तोड़ दिया है। यह शीर्षक नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक कैरी म्युलिस की दस साल पहले आई किताब का है, जिन्होंने वायरस का परीक्षण कर पहचानने की पीसीएमआर पद्धति खोजी थी और कहा था कि एचआईवी से एड्स होना असत्यापित और गलत है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने जो प्रचारित कर दिया, वही सत्य मान लिया जाता है जबकि यह केंद्र कोई प्रयोगशाला नहीं है। एड्स के प्रकरण पर कई विश्वविख्यात वैज्ञानिकों ने अफसोस प्रकट करते हुए कहा भी कि साइंस कैन डिसीव होल वर्ल्ड ईजिली। अकादमिक स्तर पर एड्स को लेकर सैकड़ों विज्ञान-सम्मत असहमतियां प्रकट की गई लेकिन अमेरिका के औषध-व्यापार की कुटिलता ने सबको दबाकर रख दिया। जाहिर है, एड्स नियंत्रण में मुक्त यौनिक जीवन शैली को प्रश्नांकित किए बगैर केवल कंडोम प्रमोशन' कार्यक्रम पर जोर देना, एक किस्म का 'मोरली डिस्ट्रक्टिव फ्रॉड' है। हकीकत यह है कि इस मुहिम का इस्तेमाल ' सेक्सोनोमिक्स ' ( यौन अर्थव्यवस्था ) को आगे बढ़ाने में किया जारहा है , जिसकी रुचि फिलहाल सबसे ज्यादा स्त्री समलैंगिकता में है। क्रिस्टीन ल्यूकर की पुस्तक ' इंडस्ट्रियलवैजाइना -  पॉलिटिकल इकॉनमी ' के पन्ने पलटें तो हमें इस बात का अंदाज आसानी से लगेगा कि जितनीविदेशी मुद्रा के लिए हमने अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोले , उसकी तुलना में कई गुना हम केवल सेक्स -टॉयज के उत्पादन से अर्जित कर सकते हैं। इसलिए शिकागो स्कूल के शातिर अपनी वित्त बुद्धि से भारत मेंयौनिकता के खुले खेल का मैदान तैयार कर रहे हैं। इसीलिए हमारे कई ' यौनानंदी ' चिंतक समलैंगिकता कोवरेण्य बनाने के लिए तर्कों का बारीक जाल बुना रहे हैं। वे लेस्बियनिज्म को बहनापा जैसे सम्मानजनक नाम सेपुकारते रहे हैं , ताकि एक निर्विघ्न यौन - उद्योग भारत में अपनी पकड़ बना सके। 
कंडोम क्रांति ने निश्चय ही सेक्स व्यापार के लिए दरवाजा बनाया। संसद और सत्ता उसे सिंहद्वार में बदलने कीप्रतिज्ञा प्रकट कर रही है। पोर्न की सर्वांग नग्नता अब युवा पीढ़ी के लिए अनुकरणीय बना दी गई है। नैतिकता अबमोरल - फोबिया जैसे नाम से अभिषिक्त होकर किसी रोग का दर्जा हासिल कर चुकी है। वे ठीक ही कहते हैं कि 'इंडियन सोसाइटी इज विक्टिम ऑफ मोरल फोबिया '  बेशक , इस भारतीय नैतिक - व्याधि या कि इसपरंपरागत - रोग से निवृत्ति में कंडोम - प्रमोशन कार्यक्रम ने एकमात्र अचूक औषधि का काम किया है। उसकेप्रचार - प्रसार की प्रविधि और दृष्टि ने विवाह को फक - फेस्ट की तरह व्याख्यायित करना शुरू कर दिया है तोनिश्चय ही समलैंगिक - विवाह को भी वैधता मिल ही जाएगी। ' नाज ' उनके पास है , जिसके पास अमेरिकी पूंजीका परनाला है। लेकिन , ' जिन्हें नाज है हिंद पर ' वे गूंगों की जमात में शामिल हो चुके हैं। समलैंगिकता केसवाल पर उनकी घिग्घी बंध चुकी है , गले में जा फंसी जीभ को पक्षाघात हो चुका है। जिनके पास शक्ति औरसत्ता है वे अपना मकसद पूरा करने के लिए न्यायालय को भी निशाना बनाने से नहीं चूक रहे हैं , उनका हाथपकड़ने वाला कोई नहीं है। 

किसके साथ जाए "आप " या भाजपा -एक धर्मसंकट

मै कांग्रेस का कट्टर विरोधी हूँ या यू कहिये कि जन्मजात विरोधी हूँ .."आप " और केजरीवाल मुझे बहुत पसंद है लेकिन आजकल एक धर्मसंकट से गुजर रहा हू कि "केजरीवाल  " के अभ्युदय से "ठाकुर तो गयो "(मोदी ) वाली स्तिथि  हो गयी है जिसका सीधा -सीधा फायदा कांग्रेस को मिलता दिख रहा है .."आप "से लाखों लोग जुड रहें है और लोकसभा में भले ही "आप " कोई बड़ा कमाल ना दिखा पाए लेकिन बीजेपी का खेल ३० -४० सीटों में तो बिगाड़ ही सकती है जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को ही मिलेगा ..हो सकता है फिर से कांग्रेस की सरकार केंद्र में फिर  बन जाए जो मै किसी भी कीमत पर नहीं चाहता ...एक तरफ केजरीवाल के प्रति मेरा मोह है वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रति कट्टर विरोध ...समझ में नहीं आ रहा कि ऐसी परिस्थितियों में किसका समर्थन किया जाए ..क्योंकि हर हाल में "कांग्रेस मुक्त भारत का सपना" काफी दिनों से देख रहा हूँ ..जो धर्मसंकट मेरे सामने है लगभग वही बहुत सारे "आप " समर्थकों में भी है (योगेन्द्र यादव के एक सर्वे के अनुसार भी )..क्या किया जाए कुछ आप लोग सुझाव दे(लोकसभा चुनाव के लिए ) "विकल्पहीनता की स्तिथि में भाजपा का समर्थन" या फिर "आप " के साथ

Monday, January 6, 2014

पंखुड़ी मिश्रा की गजलें

ख़ुश्क था जो पेड उस पर पत्तियाँ अच्छी लगी, 
तेरे होठों पर लरज़ती सिसकियाँ अच्छी लगी ! 
हर सहूलत थी मयस्सर लेकिन इसके बावजूद, 
माँ के हाथों की पकाई रोटियाँ अच्छी लगी ! 
जिसने आज़ादी के क़िस्से भी सुने हों क़ैद में, 
उस परिन्दे को क़फ़स की तीलियाँ अच्छी लगी ! 
हाथ उठा कर वक़्ते-रुख़्सत जब दुआएं उसने दीं, 
उसके हाथों की खनकती चूडियाँ अच्छी लगी ! 
हम बहुत थक-हार कर लौटे थे लेकिन जाने क्यों, 
रेंगती, बढती, सरकती चींटियाँ अच्छी लगी

 सियासत में
झूट की होती है बोहतात सियासत में, सच्चाई खाती है मात सियासत में !
 दिन होता है अक्सर रात सियासत में, गूँगे कर लेते हैं बात सियासत में ! 
और ही होते हैं हालात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !! 
सभी उसूलों वाले आदर्शों वाले, जोशीले और जज़्बाती नरों वाले ! 
मर्दाना तेवर वाली मूँछों वाले, सच्चाई के बड़े बड़े दावों वाले !
 बिक जाते हैं रातों रात सियासत में, जायज़ होती है हरबात सियासत में !! 
दिये तेल बिन जगमग जगमग जलते हैं, सूखे पेड़ भी बे मौसम ही फलते हैं ! 
खोटे सिक्के खरे दाम में चलते हैं, लंगड़े लूले भी बल्लियों उछलते हैं ! 
लम्बे हो जाते हैं हात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !! 
वोटों के गुल जब कुर्सी पर महकेंगे, नोटों के बुलबुल हर जानिब चहकेंगे ! 
बर्फ़ के तोदे अंगारों से दहकेंगे, ख़ाली पैमाने झूमेंगे बहकेंगे ! 
होगी बिन बादल बरसात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !! 
इंसाँ कहना पड़ता है शैतानों को, दाना कहना पड़ता है नादानों को ! 
ख़्वाहिशात को, ख़्वाबों को, अरमानों को, रोकना पड़ता है उमड़े तूफ़ानों को ! 
काम नहीं आते जज़्बात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !! 
जितने रहज़न हैं रहबर हो जाते हैं, पस मंज़र सारे मंज़र हो जाते हैं ! 
पैर हैं जितने भी वो सर हो जाते हैं, बोने सारे क़द आवर हो जाते हैं ! 
बढ़ते हैं सब के दरजात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !! 
जब हालात की सख़्ती से घबरा जाऊँ, ख़ुशहाली की मंज़िल मैं भी पा जाऊँ ! 
सच्चे रस्ते से मैं भी कतरा जाऊँ, जी करता है राही मैं भी आ जाऊँ ! 
मार के सच्चाई को लात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !!